रविवार, 21 फ़रवरी 2010

गीत : सबको हक है जीने का --संजीव 'सलिल'

गीत :

संजीव 'सलिल'

सबको हक है जीने का,
चुल्लू-चुल्लू पीने का.....
*
जिसने पाई श्वास यहाँ,
उसने पाई प्यास यहाँ.
चाह रचा ले रास यहाँ.
हर दिन हो मधुमास यहाँ.
आह न हो, हो हास यहाँ.
आम नहीं हो खास यहाँ.

जो चाहा वह पा जाना
है सौभाग्य नगीने का.....
*
कोई अधूरी आस न हो,
स्वप्न काल का ग्रास न हो.
मनुआ कभी उदास न हो,
जीवन में कुछ त्रास न हो.
विपदा का आभास न हो.
असफल भला प्रयास न हो.

तट के पार उतरना तो
है अधिकार सफीने का.....
*
तम है सघन, उजास बने.
लक्ष्य कदम का ग्रास बने.
ईश्वर का आवास बने.
गुल की मदिर सुवास बने.
राई, फाग हुलास बने.
खास न खासमखास बने.

ज्यों की त्यों चादर रख दें
फन सीखें हम सीने का.....
******

1 टिप्पणी:

  1. कल्याणकारी सन्देश देती प्रभावशाली अतिसुन्दर रचना...
    "ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया"...का स्मरण हो आया...

    कृपया निम्न पंक्ति में टंकण त्रुटी सुधार लें...

    "जिसने" पायी श्वास यहाँ,
    उसने पायी प्यास यहाँ...

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